याद हैं मुझे वो गुज़रा ज़माना

रोज़ तेरी ज़रा ज़रा सी बात याद किया करते थे,
और मुस्कुरा देते थे,
ज़रा ज़रा संभल संभल के मोहब्बत की थी,
तेरी हर भूल को सही साबित करने को
कोई वजह ढूंढ लिया करते थे..
झूठ खुद से जाने कितनी बार कहा था, मगर..

जिस झूठ से कुछ भला हो वो कहाँ बुरा है,
यही सोच के खुद को समझाया करते थे |
कुछ जोश था, कुछ तड़प, कुछ बेचैनी थी उन मासूम पलों में
मज़े में थी, मगर फिर भी, ज़िन्दगी मुश्किल हो चली थी
पिछले कुछ दिनों में,

रोज़ तुझे ज़रा ज़रा सा भुलाया है,
ज़रा ज़रा सी तुझ से नफरत की है
तुझे हर कदम पे इलज़ाम देने को
कुछ न कुछ वजह ढूंढ ली है
जानते हैं की ये नफरत, ये इलज़ाम सब झूठ ही है, मगर
वो झूठ जिस से कुछ भला हो, वो कहाँ बुरा है
यही सोच के खुद को तसल्ली दी है |
नजाने कैसी अजब सी शान्ति है, इस झूठे खेल में
मज़े में हो न हो, ज़िन्दगी मगर अब आसान हो चली है |

किसी को पीछे छोड़ना, कहीं से आगे बढ़ना, शायद अब आसान हो चला है….

P.S : This is not written by me.. I found this in my old word file, I probably had read it somewhere and saved it.. It’s beautiful and that is why i am posting it here..
ab asaan ho chala hai 🙂
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